Tuesday, October 16, 2012

सुरक्षा का दुरुपयोग




राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड यानी एनएसजी के नौ सौ कमांडो को विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा से हटाए जाने का निर्णय इसलिए चकित करता है, क्योंकि अब जाकर उन्हें उनके मूल काम अर्थात आतंक रोधी अभियानों के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। इसका मतलब है कि अभी तक एनएसजी कमांडो वह काम कर रहे थे जिसके लिए उन्हें तैयार नहीं किया गया था। इसका एक अर्थ यह भी है कि उनका दुरुपयोग किया जा रहा था। नि:संदेह विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा आवश्यक है और उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि जिन कमांडो को आतंकवाद विरोधी अभियान में जुटना चाहिए वे नेताओं की निगरानी करें। यह तथ्य हैरान करने वाला है कि 1992 से ही एनएसजी के कमांडो विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं। अब एनएसजी कमांडो केवल 15 विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा देख रहे हैं। यह आवश्यक हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि जिन विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा व्यवस्था से नौ सौ कमांडो को हटाया गया है उन्हें क्या वास्तव में सघन सुरक्षा की आवश्यकता है? इस सवाल का चाहे जो जवाब हो, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश में एक बड़ी संख्या में विशिष्ट व्यक्ति ऐसे हैं जो अनावश्यक अथवा जरूरत से ज्यादा सरकारी सुरक्षा के साये में हैं। इसका कारण यह है कि ज्यादा से ज्यादा सघन सरकारी सुरक्षा में रहना विशिष्टता का परिचायक बन गया है। अब तो नेताओं की विशिष्टता का एक पैमाना ही यह है कि उनकी सुरक्षा में कितना बड़ा अमला तैनात रहता है। इस संस्कृति का परिणाम यह है कि अब हर नेता को सरकारी सुरक्षा चाहिए। एक अनुमान के अनुसार हर राज्य में नेताओं की सुरक्षा में जरूरत से ज्यादा पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। हालांकि इससे आम सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था निर्धारित करने के कोई मानदंड तय नहीं हो पा रहे हैं। इस मामले में जो स्थिति राज्यों के स्तर पर है वही केंद्र के स्तर पर भी है। समस्या केवल यह नहीं है कि नेताओं की सुरक्षा में आवश्यकता से अधिक पुलिसकर्मी तैनात करने पड़ रहे हैं, बल्कि यह भी है कि अन्य संसाधन भी खपाये जा रहे हैं। विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा में पुलिसकर्मियों अथवा सुरक्षा जवानों के साथ-साथ गाडि़यों का काफिला देखते ही बनता है। यह समझना कठिन है कि विशिष्ट व्यक्तियों के सुरक्षा काफिले में चार-छह-दस गाडि़यां क्यों होनी चाहिए? हालांकि सरकारी सुरक्षा के दुरुपयोग के मामले सामने आते ही रहते हैं, लेकिन विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के कोई स्पष्ट मानक तय करने से बचा जा रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो नौ सौ कमांडो विशिष्ट व्यक्तियों की निगरानी नहीं कर रहे होते। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा में लगे नौ सौ कमांडो को वापस बुला लिया गया, क्योंकि यह लगभग तय है कि उनका स्थान दूसरे सुरक्षाकर्मी ले लेंगे। यदि ऐसा कुछ होता है तो यह सुरक्षा व्यवस्था के दुरुपयोग का नया उदाहरण होगा। बेहतर हो कि ऐसा कोई मानक बने जिससे विशिष्ट व्यक्तियों को सरकारी सुरक्षा देने का काम मनमाने तरीके से न हो सके।

Dainik Jagran National Edition 16-10-2012 सुरक्षा Pej-8

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