सन 1962 में हुई भारत-चीन लड़ाई के 50 साल पूरे
हो रहे हैं। इन 50 वर्ष की अवधि के बाद दोनों देश रिश्तों के लिहाज से किस स्थिति में
हैं, चीन की तरफ से रक्षा चुनौतियां कैसी हैं, यदि युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो दोनों देशों की सैन्य ताकत कैसी है, कौन किस क्षेत्र में भारी है और कौन किस क्षेत्र में कमजोर है आदि बातों पर एक विहंगम दृष्टि
डालने की आवश्यकता प्रतीत हो
रही है। इसके लिए सबसे पहले सन 1962 की लड़ाई पर एक
संक्षिप्त नजर डालनी आवश्यक
है। 8 सितंबर, 1962 को चीन भारत-भूटान-तिब्बत त्रिकोण पर स्थित थगला दर्रे पर प्रारंभिक आक्रमण किया और चीनी सेना
बढ़ती हुई नमकाचू नदी के
उत्तरी किनारे तक आ गई। नमकाचू से सात मील पहले तक चीन सड़क बना चुका था और यहां तक रसद पहंुचाई जा चुकी थी।
इसके बाद एक माह तक छिटपुट आक्रमण चलते रहे, लेकिन भारत
आक्रमण का जवाब देने की कोई तैयारी नहीं कर सका था, जबकि यह तैयारी
के लिए पर्याप्त समय था। 20 अक्टूबर को भारत
पर चीन का भरपूर आक्रमण
हुआ। 32वें दिन 21 नवंबर को चीन ने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा करके युद्ध बंद कर दिया। भारत विदेश नीति व
अंतरराष्ट्रीय राजनय की धोखेबाजी, सीमांत क्षेत्रों में यातायात व
संचार साधनों की कमी, गुप्तचर सेवा की कमी, सैन्य साजो-सामान
व आधुनिक हथियारों की कमी एवं पर्वतीय क्षेत्रों में लड़ने की अनुभवहीनता के कारण भारत पराजित हुआ। इस पराजय के बाद भारत ने सबक लिया और रक्षा
की तरफ ध्यान देना शुरू किया। सेना की एक नई केंद्रीय कमांड बनाई गई तथा भारतीय सेना में चार डिवीजन बढ़ाए गए। इसे अलावा बॉर्डर टास्क फोर्स का
गठन किया गया। पराजय की जिम्मेदारी स्वीकार करके जनरल थापर ने त्याग-पत्र दे दिया और जनरल जे.एन. चौधरी नए सेनाध्यक्ष बने। पराजय के कारणों
की जांच के लिए लेफ्टिनेंट जनरल हैंडरसन ब्रूक्स के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया गया, लेकिन राष्ट्रहित, सुरक्षा व गोपनीयता की आड़ में इस
आयोग की रिपोर्ट को उजागर नहीं किया गया। सन 1962 की लड़ाई के बाद
से जम्मू-कश्मीर की 38 हजार वर्ग किलोमीटर भारतीय भूमि चीन के कब्जे में है। इसके अलावा
पाकिस्तान ने तथाकथित
चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते के तहत 5180 वर्ग
किलोमीटर भारतीय भूमि चीन को दे रखी है। चीन अरुणाचल प्रदेश में भी 90 हजार वर्ग किलोमीटर भारतीय भूमि पर अपना अवैध दावा करता है। पांच दशकों की अवधि में चीन से लगने वाली सीमा पर भी सामरिक
चुनौतियां बढ़ गई हैं। चीन ने
सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों तक सड़कें, रेल मार्ग व हवाई
अड्डे एक रणनीति चाल के तहत बनाए हैं। चीन ने अंतरराष्ट्रीय सीमा तक अपनी सैन्य तैयारी बढ़ा रखी है। इन
चुनौतियों के मद्देनजर सेना दो माउंटेन स्ट्राइक कोर बनाने की योजना है। भारतीय सेना की वर्तमान
सैन्य संख्या 11 लाख से ज्यादा है जिनमें 35 हजार से ज्यादा अधिकारी हैं। भारत के पास लगभग 2462 लड़ाकू विमान, 5000 मुख्य
युद्धक टैंक, 175 नैवी जहाज व 80 परमाणु अस्त्र हैं। गौरतलब है कि चीन सीमा पर चीनी सेना की ताकत बराबर बढ़ाई जा रही है। ऐसे में चीनी सैनिकों की बढ़ती आमद
से भारतीय सेना का सतर्क होना लाजिमी है। सन 1962 से अब तक इन पांच
दशकों में देश की सैन्य शक्ति काफी बढ़ी है और किसी भी देश के नापाक इरादों को नेस्तनाबूद करने में सक्षम हुई है परंतु भारत को चुनौती प्रस्तुत करने वाली
चीन की सक्रिय सेना 34.4 लाख व आरक्षित सेना 12 लाख है। उसके लड़ाकू विमानों की संख्या 5176, मुख्य टैंक 7500, नैवी जहाज 972
व परमाणु अस्त्रों की संख्या 240 के आसपास है। निश्चित तौर पर हम 1962 जितने कमजोर नहीं
हैं, इसलिए अगर दोनों देशों में टकराव होता है तो यह एकतरफा नहीं होगा। एक
सत्य यह भी है कि दोनों देश अपनी अर्थव्यवस्था के मद्देनजर युद्ध की स्थिति आने नहीं देंगे। (लेखक सैन्य विज्ञान विषय के प्राध्यापक हैं) भारत-चीन युद्ध की 50वीं वर्षगांठ पर डॉ. लक्ष्मी शंकर यादव की टिप्पणी चीन युद्ध के सबक
Dainik Jagran National Edition 16-10-2012 सुरक्षा Pej-8
No comments:
Post a Comment