नई दिल्ली (एसएनबी)। वर्ष 1962 में चीन की सेना
अरुणाचल प्रदेश की सीमा से
भारत में घुस आई थी। वह जंग देश हार गया था। युद्ध के 50 सालों में भी चीन से
लगे पूर्वोत्तर क्षेत्र में सैन्य सुविधाओं की जिस तेज गति से स्थापना और
विकास होना चाहिए था, वह
नहीं हो सका है। आलम यह है कि वर्ष 2010
में
पूर्वोत्तर सेक्टर के आठ हवाई पट्टिटयों का अपग्रेडेशन कर
उन्हें वायुसेना के
विमानों के उतरने के काबिल बनाने की 1750
करोड़ रुपये की परियोजना पर अभी तक 20 फीसद भी काम नहीं
हो सका है। इसके पीछे वन विभाग की अड़गेबाजी बताई जा रही है। वायुसेना प्रमुख
एयरचीफ मार्शल एनएके ब्राउन इस
अतिमहत्वपूर्ण परियोजना की कछुआ चाल से काफी चिंतित हैं। चीन
की कुदृष्टि अरुणाचल
प्रदेश पर शुरू से ही है। वह इस प्रदेश को अपना अंग मानता है। अक्सर
दावा भी करता रहता है। चीन ने अरुणाचल से लगी अपनी सीमा में शुरू से ही
वृहद सैन्य सुविधाओं का विस्तार कर रखा है। 1962
में चीनी सेना जब
अरुणाचल में घुस आई थी,
तो उस वक्त भी उनका सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर काफी मजबूत
था। लेकिन 1962 युद्ध
के बाद भी चीन से लगे भारतीय भूभाग पर सैन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ
है। योजनाएं-परियोजनाएं लालफीताशाही,
अड़ंगेबाजी और लेटलतीफी की शिकार हैं। पूर्वोत्तर में चीनी
खतरे को देखते हुए
भारतीय वायुसेना ने अरुणाचल प्रदेश (ईस्टर्न सेक्टर) के आठ एडवांस्ड लैंडिंग
ग्राउन्ड्स (एएलजी) यानी कि हवाई पट्टियों (परिघाट, मेचुका,
वेलांग, टूटिंग, जीरो, एलांग
तथा विजय नगर) को अपग्रेड कर उन्हें वायुसेना के परिवहन और लड़ाकू विमानों के उतरने
के काबिल बनाने की योजना बनाई है। यह
एएलजी अभी तक हेलीकाप्टर उतरने के ही काबिल हैं। वर्ष 2010 में 1750 करोड़ रुपये
की इस परियोजना को केंद्र सरकार ने हरी झंडी दे दी। इस पर निर्माण काम
भी शुरू हो गया, लेकिन
काम की गति बहुत धीमी रही। सूत्रों ने बताया कि हवाई पट्टियों के विस्तार और
अपग्रेडेशन में वन विभाग और अन्य संबंधित
विभागों की अड़ंगेबाजी तो आड़े आ ही रही है, इतनी अधिक ऊंचाई पर पहाड़ी दुर्गम
क्षेत्र में निर्माण सामग्रियों के पहुंचने में भी भारी दिक्कत का सामना
करना पड़ रहा है। मैटेरियल की अनुपलब्धता और सरकारी अड़ंगेबाजी के चलते
दो साल बीतने के बाद भी इस पर 20 फीसद काम भी पूरा नहीं हो सका है। वायुसेना प्रमुख पूर्वोत्तर में हवाई
पट्टियों के अपग्रेडेशन की 1750 करोड़
की इस अहम परियोजना की ‘गति’ से
चिंतित हैं। इस बावत ‘राष्ट्रीय
सहारा’ के सवाल
पर उन्होंने कहा कि अगर यही रफ्तार रहा तो चार-पांच साल और लग जाएंगे।
प्रोजेक्ट में अरुणाचल की आठ हवाई
पट्टियों का हो रहा अपग्रेडेशन
काम की धीमी गति से वायुसेना प्रमुख ब्राउन चिंतित
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